
पूज्य गुरुदेव अपने गुरुदेव श्री डॉ नारायण दत्त श्रीमाली जी के बारे में बात करते हुए अक्सर बताते हैं कि गुरुदेव से मेरी प्रथम दृष्ट्या मई माह 1984 को मिला जब मुझे गुरुदेव का पत्र प्राप्त हुआ। और उसी कड़ी के रूप मुझे तारा साधना की दीक्षा प्राप्त हुई। उसके पश्चात मुझे गुरुदेव श्रीमाली जी का निरंतर साथ मिलता रहा और मेरी आध्यात्मिक खोज लगातार बढ़ती रही।
आज मैं अतीत के पन्नों को देखता हूँ उसमें कई प्रकार के अनमोल हीरे दिखाई देते हैं जो पूज्य गुरुदेव श्रीमाली जी के द्वारा प्रदान किए गए।
पूज्य गुरुदेव श्री दिनेशानंद जी ने अपने गुरुदेव श्री डॉ नारायण दत्त श्रीमाली जी से प्रथम दीक्षा 1984 को प्राप्त की और आध्यात्मिक खोज के साथ कई प्रकार के साधनात्मक आयामों को संपूर्णता के साथ सम्पन्न किया। लक्ष्य केवल एक था — अपने गुरु कार्य को पूर्ण समर्पण के साथ आगे बढ़ाना और समाज में पूर्ण आध्यात्मिकता की खोज में भटके हुए साधकों को आगे ले जाना।
गुरुदेव ने इस कार्य के लिए अपने संपूर्ण जीवन को गुरु चरणों में न्यौछावर कर दिया और उस गुरु परंपरा को एक नई राह प्रदान की।
जिसके अंतर्गत गुरुदेव ने नाड़ी योग, गुरु तत्त्व साधना, प्राणायाम साधना, शिव साधना और कई जटिल साधनाओं की प्रक्रिया को छुआ। आज भी वे समस्त प्रक्रियाओं को बड़ी सुगमता से अपने शिष्यों को प्रदान करते हैं और जिज्ञासु साधकों की जटिल समस्याओं का समाधान करते हैं।